मैं अपना पहला विचार “””””””””धर्म और राजनीति””””” के संबंध में रखना चाहूंगा !!
सबसे पहले धर्म को समझिए:- उन्हीं गुणों को धर्म कहते हैं जिन को धारण किया जा सके जिनके धारण से आपका आपके विचार और आपका आचरण उच्च कोटि का हो जाए ! अब राजनीति को समझते हैं राजनीति का मतलब होता है “”””राज्य की नीति””” किसी भी राज्य को चलाने के लिए कुछ नीतियां निर्धारित की जाती हैं उन्हीं नीतियों को राजनीति कहा जाता है !!
नैरेटिव ( मनोविचार ) का मतलब होता है कोई ऐसी सूचना जिसको बार-बार दोहरा कर हमारे मन में एक विचार की भांति बिठा दिया जाए !!
इस विषय पर अपने विचार रखने से पहले आज के जनमानस में फैले हुए एक व्यापक नैरेटिव के बारे जान लेना महत्वपूर्ण है !! आजकल बहुत से सनातनी बंधुओं के मन में यह विचार ( मनोविचार ) नैरेटिव घर कर गया है कि धर्म और राजनीति का संबंध एक दूसरे से है ?? इस नैरेटिव को बनाने वाले यह कहते हैं कि हिंदूवादी पार्टियां धर्म का उपयोग राजनीतिक फायदे के लिए करती है , धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहिए या धर्म और राजनीति एक दूसरे के विपरीत ध्रुव के दो शब्द है |
लेकिन आइए इस विचार को एक नई दिशा से समझा जाए इन विषयों पर एक-एक करके विचार रखना चाहूंगा मैं पहला विचार अपने पौराणिक काल से उदाहरण सहित रखना चाहूंगा
हमारे आराध्य श्री रामचंद्र जी महाराज हमारे आदर्श भी हैं वह धर्म के सबसे बड़े ज्ञाता है कुशल राजनीतिज्ञ भी हैं और उनके काल में उनके राज्य में सभी प्राणी सुख सहित रहते थे! उसी काल में राजा बाली भी हुए जो कि वीरों में वीर थे! जो लंकाधिपति रावण को अपनी बगल में 6 महीने दबाए जंगल जंगल घूमते रहे ! लेकिन वे दोनों प्रभु श्रीराम के कोप के भाजन बने क्यों क्योंकि उसकी राजकीय नीति यानी राजनीति धर्म आधारित नहीं थी वह अधर्म के मार्ग पर चल रहे थे !
उनके अधर्म और दुर्गति को इसी लोकोक्ति से समझा जा सकता है """ 1 लाख पुत्र सवा लाख नाती पर रावण के घर दिया ना बाती """
वहीं दूसरी तरफ धर्म की नीति पर चलते हुए सुग्रीव जी ने प्रभु श्री राम का साथ दिया प्रभु श्रीराम के मित्र कहलाए , राजपाट भी दोबारा प्राप्त हुआ यश और कीर्ति युग-युगांतर तक फैली है और आगे भी रहेगी !!! इसी तरह से विभीषण रामस्नेही हुए और लंकाधिपति बने !
मित्रों द्वापर युग में भी प्रभु श्री कृष्ण जी ने धर्म की राजनीति की उनके सानिध्य में जहां पांचो पांडव धर्मश्रेष्ठ हुए वहीं अधर्म मार्ग पर चलते हुए राजनीति करने वाला दुर्योधन यानी कौरव वंश का समूल नाश हुआ ! इसी तरह से मथुरा में हर एक वैभव के होते हुए भी मथुरा का विनाश सुनिश्चित हुआ ,,, कारण केवल अधर्म आधारित राजनीति था!
परंतु धर्म मार्ग पर चलने वाले गांव पहाड़ों में रहते हुए भी नंदनगरी नंदगांव, बरसाना , वृंदावन वासी उस काल में भी श्रेष्ठ गुणों को धारण करने के कारण भगवान कृष्ण जी को सबने बाल सखा के रूप में प्राप्त किया !
इन उदाहरणों से आपको यह स्पष्ट हो जाएगा कि धर्म मार्ग पर चलने की शिक्षा तो प्रभु श्रीराम और प्रभु श्रीकृष्ण जी ने भी दी है ! धर्म और राजनीति दोनों एक दूसरे के विपरीत ध्रुवीय शब्द नहीं है बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं एक दूसरे के पूरक हैं !! जैसे सिक्के का एक भाग नष्ट कर दिया जाए तो वह सिक्का खोटा हो जाता है उसका कोई मूल्य नहीं रहता !
अगर राजनीति में से धर्म को अलग कर दिया जाएगा तो राजकीय नीतियां अधर्म को पोषित करेंगी अधर्म से चलने वाली राजनीति लोगों का अहित ही करेगी ! इसी प्रकार से राजनीति और धर्म आज भी एक ही सिक्के के दो पहलू बने हुए हैं ! धर्म मार्ग पर चलते हुए ही राजकीय नीतियों का निर्धारण करके राजनीति को लोक कल्याण नीति में बदलना ही सही राजनीति है !
इस विषय को थोड़ा विस्तार देने के लिए में आजकल के केवल दो राजनीतिज्ञों का उदाहरण देता हूं जो राज्य नीति ( राजनीति) का निर्धारण कर कर रहे हैं उसमें सबसे बड़ा नाम उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री योगी जी आदित्यनाथ का है और वही दूसरी तरफ राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं
जहां योगी आदित्यनाथ धर्म मार्ग पर अडिग रहते हुए अपने धर्म का पालन तो कर ही रहे हैं पर राजनीति भी धर्म मार्ग पर चलते हुए ही कर रहे हैं ! उनके राज्य में हिंदू संस्कृति सनातन संस्कृति का उदय होता जा रहा है ,,, सनातन संस्कृति का सूर्य अपनी ऊंचाइयों को छू रहा है ,,, दूसरी तरफ अशोक गहलोत जी के राज्य में जनता पीड़ित है अपने धार्मिक त्योहारों को मना पाने में अक्षम है ( रोजाना की खबरें देखें सब स्पष्ट हो जाएगा)! उनकी राजनीति और धर्म के ऊपर उनकी समझ को अगर एक साथ रखते हुए दोनों ही राज्यों में जनता की परिस्थितियों को देखेंगे तो स्पष्टता से समझ पाएंगे कि धर्म और राजनीति या धर्म की राजनीति या धर्म आधारित राजनीति किस लिए आवश्यक है!
मित्रों जब कोई वामपंथी बुद्धिजीवी या सेकुलर बुद्धिजीवी आपको धर्म और राजनीति दोनों को अलग विषय के रूप में समझाता है तो समझिए वह आपको एक ऐसे नैरेटिव ( मनोविचार ) में फंसा रहा है जिसमें आपके राज्य की राजनीति अंतत: किसी विधर्मी को चुनने पर समाप्त हो जाएगी ! इसलिए हमेशा अपने सनातन मूल्यों को श्रेष्ठ जानते हुए धर्म के मार्ग पर चलने वाले राजनीतिज्ञ को चुनना ही आप की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि धर्म और राजनीति ना तो सतयुग में ना द्वापर युग में ना महाभारत काल में अलग थे और ना ही आधुनिक युग में अलग है!! धर्म और राजनीति दोनों एक ही है! क्योंकि धर्म को जब तक राजनीति का संरक्षण प्राप्त नहीं होगा धर्म अपनी आभा खो देगा धर्म समाप्त हो जाएगा ! अगर हम अब भी राजनीतिक संरक्षण का महत्व धर्म के विषय में ना समझ पाए तो अंतता: हम भी समाप्त हो जाएंगे !!
आपको भली-भांति ज्ञात है कि जब हम अखंड भारत की बात करते हैं तो उस समय राजनीतिक संरक्षण प्राप्त करते हुए धर्म की परिधि कहां तक फैली हुई थी हमारे धर्म की कीर्ति किन-किन देशों में फैली हुई थी जैसे-जैसे उन देशों के राजा अधर्मी हुए या अन्य धर्मों को अपनाते चले गए उन राजाओं का राज्य भी समाप्त हुआ !! आज हम सिकुड़ते सिकुड़ते भारत में पहुंचे हैं भारत में भी आज हम कई राज्यों में धर्म आधार पर अल्पसंख्यक हैं!
एक और आग्रह करना चाहूंगा जब भी आप किसी सनातनी बंधुओं से राजनीतिक के ऊपर चर्चा करें तो पार्टी अलग हो सकती है पर आप दोनों की सहमति इस विषय पर होनी चाहिए कि आपका धर्म एक है तो जो पार्टी आपके धर्म को संरक्षण प्रदान करती है आपके धर्म के ज्यादा नजदीक है आप उसका समर्थन करिए ! उसी पार्टी को चुनिए जो आपके धर्म को महत्व देती है!!
अपनी कलम को विराम देने से पहले मैं फिर अपनी प्रथम लाइन दोहराता हूं आपके अंतर्मन के इस वैचारिक द्वंद को सामने लाने के लिए ही मैंने प्रथम पंक्ति भी यही रखी थी !
Our Motive ( हमारा लक्ष्य ) VS Narrative ( मनोविचार ) हमारे सनातन समाज के लक्ष्य और हमारे सनातन समाज के मनोविचार दोनों अलग-अलग दिशा में कार्य कर रहे हैं ! यह क्यों कह रहा हूं क्योंकि इसके लिए मेरे पास बहुत सारे तर्क हैं ! अभी हमारा लक्ष्य तो है रामराज्य लाना पर वामपंथी नैरेटिव ( मनोविचार ) के भ्रम जाल में फंस कर अधिकतर सनातनी बंधु यही कहते फिर रहे हैं कि धर्म को राजनीति से अलग रखो धर्म और राजनीति दोनों अलग-अलग है !!
इस लेख के द्वारा मैंने आपके विचारों में कुछ स्पष्टता लाने का प्रयास मात्र किया है ! आशा करता हूं किस लेख के माध्यम से मैं कुछ हद तक इस विषय को समेटने में सफल रहा हूंगा!! अभी मैं अपनी वाणी को विराम देते हुए आपसे कुछ तर्कशील प्रश्नों की इच्छा रखता हूं !! ताकि मैं आपके प्रश्नों का उत्तर दे पाऊं !!
आपका अपना
अरविंद कुमार कौंडल
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